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Sunday 20 July, 2008
 10:31 | 14/May/2008 |  17 Comment(s)
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जयपुर की सड़कें अगर बोल सकतीं ------

कौन हैं ये लोग ? नहीं ,ये कतई इंसान नहीं हो सकते?,न हीं इनका किसी धर्म से कोई वास्ता हो सकता है क्या एक इन्शान ऐसा घृणित तांडव कर सकता है ?क्या कोई धर्म इसकी इजाजत देता है ?जयपुर की सड़कें अगर बोल सकतीं, तो शायद हम इंसानो से यही सवाल करतीं! 13 मई 2008 जयपुर के पहले, हैवानियत का यही तांडव हैद्राबाद, अजमेर, वाराणसी,मुंबई आदि-आदि कई स्थानो पर देश में दोहराया जा चुका है? सवाल खड़ा होता है कि आखिर मुठ्ठीभर रुग्ण मानसिकता के लोग हमारे विशाल तन्त्र को कैसे अंगूठा दिखाने में सफल हो जा रहें हैं? सवाल हम सबकी अंतरात्मा भी हम से कर रही है,क्या हम सिर्फ मूकदर्शक बनकर सवेंदनाएँ व्य़क्त भर कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लें?

हर व्यक्ति को कम से कम दो स्तर पर तो काम करने की कोशिश करनी ही चाहिए.एक,हम स्वयं इसपर जिम्मेदारी का परिचय दें, कमसे कम इसके विरोध में कुच्छ न कुच्छ अभिव्यक्ति जरूर दें, इसके लिए प्रिट मीडिया,इलेक्ट्रानिक मीडिया अथवा जहाँ आपको अभिव्यक्ता का मंच मिले,वँहा सिर्फ घटना की आलोचना ही नहीं एक मुहिम के रूप में ,हमारे सत्ता के कर्णधारों से पुछे कि आखिर एक ही तरह कि घटनाओं क़ी पुनरावृति कैसे हो रही है? पिछलि घटनाओं पर कितनी छानबीन, अनुसंधान , नीति आदि आदि अपनाई गयी और उसपर कितना अमली जमा पहनाया गया ?लोकतंत्र में जनता का भय खाकर ,अगर ,सत्ताधीश एक आतंकवादी को सुप्रीमकोर्ट के निर्णय के बाद भी फांसी देने में घबरा रहें हैं,तो क्या,जनता बड़ा वर्ग उनसें जयपुर जैसी घटनाओ में माताओ,बहनो, मासूम बच्चो की मौत का हिसाब माँगने लगेंगे तो असर नहीं होगा? निश्चित तौर उंहें सिर्फ मौत के तांडव पर ही रेड अलर्ट जारी करने की फिक्र नहीं होगी ,अपितु हमेंशा तन्त्र को रेडी रखने की भी चिंता की तो शुरूवात करनी होगी?हमारा लोकतंत्र वर्तमान में सिर्फ और सिर्फ जाती,धर्म,प्रदेशिकता,भाषा,आदि आदि गैर जरूरी मूल्यों के इर्दगिर्द घूमरहा है,तो उसे मानवीय मूल्यों के प्रति भी सजग हो इसकी पहल हमें ही करनीहोगी.

दूसरा, शायद हम एक काम और कर सकते हैं कि हम किसी भी धर्म,पंथ,संप्रदाय के हों अगर कहीं भी चाहे वह कोई धार्मिक स्थल ही क्यो न हो यदि वहा इन्शनियत को खत्म करने का कारोबार संचालित किए जाने क़ी कोशिश हो रही हो ,तो इसका विरोध होना चाहिए चाहे इसके लिए आपको वह धर्म अथवा संप्रदाय छोड़ना क्यो न पड़े .वरना जयपुर की लाशों में, आपका भी कोई भाई बंधु कल दिखे ,तो पछतावे के आला कुछ नही रह जायेगा .हम एक जैसा पानी पीते हैं,एक जैसी हवा से सास लेकर जिंदा है,हाड़ -मास का शरीर भी एक जैसा है.फिर धर्म के नाम पर ,क्या हम एक दूसरे को खत्म करने क़ी शौच सकते हैं.?सच तो यह कि ईश्वर भी हम सबका एक है,नाम सिर्फ अलग-अलग है.कब समझेगे ये हम. आओ हम जयपुर के मासूम आहूतों को श्रद्दांजलि दें..ओम शांति--------

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