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कुदरत का कोहिनूर - पोन्ग ग्यांग लेक
''इस पत्थर को आप छोड़ दीजिए,अपने आप इस पहाड़ी क़ी गर्त में चला जाएगा,पर इसे पहाड़ क़ी चोटी पर ले जाने के लिए बहुत प्रयास करना होगा.ठीक इसी तरह है भौतिक प्रगति और अध्यात्मिक प्रगति में भिन्नता है. एक सरल है जो भौतिक है,दूसरी कठिन है, पर यही मानव जीवन का सार है,निर्वाण का पथ है.'' यह प्रेरक उदगर थे पूजनीय एक लामा के हेमिस गुम्पा में.यह गुम्पा लद्दाख क़ी सबसे प्राचीन और प्रसिद्द गुम्पा में से एक है.इसका पूरा वातावरण चित्ताकर्षक है. पथ परंपरा के गुरु क़ी विशाल आभा युक्त लावण्यमय मूर्ति,पंक्ति बद्द होकर बैठे लामा-ओ का सस्वर ग्रंथो का पाठ,बोद्द धर्म पर तिब्बती भाषा में लिखी प्राचीन पांडु लिपियों का दुर्लभव संग्रह और सलीके से रखी गयी सामग्री लुभाती है.छोटे लामा-ओ क़ी उपस्थिति पर हमें जानने क़ी जिग्यासा हुई तो पता चला क़ी बहुत से परिवार लड़कपन से उन्हे दीक्षा के लिए गुंपाओ को सौंप देते हैं .यह लद्दाख क़ी परम्परा का हिस्सा है.ऐसा हमें अन्या गुप्ाओ में भी देखने को मिला . लेह के आस-पास गुंपाओ और अन्या जगहो को देखने के बाद ,हम लद्दाख का सबसे आकर्षण का केन्द्र पोन्ग ग्यांग झील को देखने को निकल पड़े .यह लेह से कोई 160 कि.मी.दूर है.बीच का पूरा रास्ता पथरीले रेगिस्तान का और घुमावदार पहाड़ियो वाला है.बीच में दुनिया का सबसे उंचा तीसरा सड़क मार्ग 'चांगला दर्रे '' से होकर हम गुजरे तो प्रकृति कि हमपर विशेष अनुकम्पा हुई,शानदार बर्फ़बारी ने मानो हमारी मुँह मांगी मुराद पूरी कर दी.साथ ही इस स्थान पर पहुँचकर हमें भारत-चीन युद्द में हमारे सैनिको का, वो शौर्य याद आया, जंहा से,चीनी ड्रेगन को देश के बहादूर सैनिको ने करारी शिकस्त दी थी, इसके बाद चीन एक-तरफ़ा युध्य बंदी कि घोषणा करनी पड़ी थी. चांगला से कोई 60 कि.मी. की दूर तय कर हम पहुन्चे, पोन्ग ग्यांग झील.प्रकृति का एक अदभुय नजारा,इतनी विराट झील,इन सूनी पहाड़ियो के बीच हो सकती है? यह अहसास रोमाचाक और दाँतों तले अंगुली दबाने जैसा है.झील की रमणीयता को व्य़क्त कर मेरे लिए संभव नहीं ज़ान पड़ रहा है.पानी की छटा बिल्कुल ही निराली ,एकदम नीला और हा रंग वर्णटीत है.दूसरी तरफ पॅहडो की सुन्दरता भी मनमोहक है.भुरे,स्याह काले, नीले,पहाड़ इतने लुभावने हैं कि जान पड़ता है कि मानो स्वयं भगवान इन पर कनवास के रंग भरे हो.बीच-बीच में बर्फ ढके पहाड़,ठंडी बहती हवा और झील की गरजना, तो मानो समुन्द्रा के किनारे का अहसास करा रही है.प्रकृति का इतना विविधतापूर्ण नजारा शायद ही और कहीं देखने को मिले.झील के किनारे आगे बढ़ने पर एक स्थान पर हमें रोक दिया गया .पता चला इस झील की लगभग 130कि.मी.लंबाई में से दो-तिहाई भाग पर सन 1962के युध्य में चीन ने कब्जा कर रखा है.हमे लगा चीन हमारी प्रकृति के खूबसूरत कोहिनूर पर कब्जा कर रखा है.जो एक उदास करने वाला असहनीय पल आपको लगेगा.इसे झील नहीं आप शेष -शायी भगवान विष्णु का क्षीर सागर कह सकते हैं,तभी तो इतना सुंदर अहसास हो रहा है.मैं तो यही कह सकता हूँ कि बिना पोन्ग ग्यांग झील जाए,आपका लद्दाख जाना अधूरा ही होगा.
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