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Sunday 20 July, 2008
 16:06 | 10/Apr/2008 |  18 Comment(s)
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ये तो शिव का साक्षात था-----------

हम चकित थे, प्रकृति के अद्भुत सौंदर्य से. सूरज की लालिमा के साथ ग्लेशियर सुर्ख ताम्र वर्ण से दमक रहा था. सब अपलक, अनिमेष निहार रहे थे. मानो, साक्षात भगवान शंकर का अवतरण हुआ है. एक पल को याद आया की क्यों कथाओं में और लेखों में सूरज की पहली किरणों को सविता कहा गया है. सविता यानी ग्यान, मेधा और प्रग्या की साक्षात देवी जिसकी महिमा वेदों में गायत्री मंत्र में महिमा मंडित की गई है. सचमुच आज हम इन पहाड़ियों के बीच न होते तो जीवन में सविता के इस साक्षात स्वरूप को नही समझ पाते. इतना अद्भुत सौंदर्य था, ग्लेशियर पर पड़ने वाली सूरज की पहली किरणों का . शायद उसे शब्दों में पिरोना मेरे लिए तो संभव नही है. इतना जरूर है कि शिव और सविता के साक्षात स्वरूप को हम महसूस कर पाए . उस अद्भुत कुद्रात के सौंदर्य में.
हम ऊनिन्दे, अलसुबह 4 बजे कैलन्ग से लेह के लिए रवाना हुए थे. तो कड़ाके की ठंड और नींद दोनो बड़ी तकलीफ़देह लग रही थी.लुचूलुंग दर्रा (16600 फीट) पारकर हम बस से इस रास्ते के सबसे उँचे दर्रे टांगला (17469 फीट) की ओर जा रहे थे. दूर -दूर् तक वीरान पहाड़ियों पर हरियाली का तो नामोनिशान नही था. धीरे-धीरे बस बढ़ने के साथ ऐसा लग रहा था कि हमने खतरनाक और बंजर रास्ते को चुनकर शायद बड़ी भूल कर दी है, पर प्रकृति जितनी कठोर होती है उसका सौम्य रूप भी उतना ही अद्भुत होता है. टांगला के पहले बर्फ पर पद सूरज की किरणों ने हम सब को मोह लिया था. हमने मनाली के ठीक पहले भीषण बारिश में बादल फटने की घटना के साक्षात गवाह थे, जिसमे कई ट्रक और गाड़ियाँ घाटी में बह गई थी. हम उस खतरनाक लम्हे को याद कर अब समझ गये थे कि वो शिव का रुद्र रूप था और सामने कल्याणकारी शिव के दर्शन इस ग्लेशियर पर पड़ती सूरज की किरणों से हो रहा है. टांगला दर्रे की सबसे उँचे स्थान पर जाते ही बस खड़ी हुई. हमारे साथ उपस्थित मुझे और अन्य दो साथियों को छोड़कर सबको उल्टियां हो रही थी और सब चक्कर आने की शिकायत कर रहे थे. वहाँ उपस्थित जवानो ने आवश्यक हिदायत दी और सबको लहसून की कलियाँ खाने को थमाया. टांगला के बाद हम जैसे-जैसे आगे लेह की ओर बढ़ते गये दुर्गम पहाड़ी रास्ते में झीनी सी बिछी बर्फ की चादर मन को भा रही थी. लेकिन पहाड़ इतने वीरान थे कि वहाँ जीवन कि कोई छटा नजर नही आ रही थी. ना पक्षी, ना कीट, ना पतंग, ना पशु और ना मानव, सब कुछ वीरान और वीरान ही नजर आ रहा था. पहाड़ियों की ज़ंसकार रेंज आने के बाद बताया गया कि आगे रूंगत्से से पहला गाँव पड़ेगा.
वस्तुत: हमारी यह यात्रा 21 साथियों के साथ एक छोटा सा विचार लेकर छत्तीसगारः से शुरू हुई थी जिसके बीच के पड़ाव से हम गुजर रहे थे.सचमुच यात्रा दुर्गम थी पर प्रकृति का अद्भुत सौंदर्य इन कठोरताओं में ही लावन्या बिखेर रहा था, जिसे अनुभूत किए बिना नही समझा जा सकता. यात्रा की शेष जानकारी किसी अन्य दिन आपसे बांटने की कोशिश फिर करूंगा

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