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Sunday 20 July, 2008
 16:53 | 29/Mar/2008 |  5 Comment(s)
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इसे तो हम कर सकते हैं

सुबह के लगभग 9 बजे होंगे, मैं शाला के निरीक्षण में पहुँचा. पता चला, रिशेस है. कुछ बच्चे टिफिन खोलकर खाना खा रहे थे, कुछ उनके पास बैठे उन्हे निहार रहे थे. मैं नज़दीक पहुँचा. एक बच्चे से बात की, पूछा, तुम टिफिन नही लाते? बच्चा 8 साल का रहा होगा, अबोध भाव से कहा, नही सर. मेरे यहाँ टिफिन नही बनती है. मेरे दाई-ददा (मा-बाप ) तो काम पर चले जाते हैं.मैने देखा कई छोटे बच्चे अबोध भाव से साथी से ख़ांना भी माँग रहे थे. यह दृश्य मुझे अत्यंत विव्हल कर रहा था. मैं समझ गया था कि ये सारे बच्चे जिनके पास टिफिन नही है, वो श्रमिक परिवारों के बच्चे हैं, जहाँ दो जून की रोटी के लिए भी जी-तोड़ मेहनत करनी पड़ती है. मैने तत्काल प्रधान पाठिका से बात की, फिर प्राचार्य को भी बुलवाया. हमने एक मीटिंग की, मैने तर्क रखा, इस तरह रिशेस में कुछ बच्चे टिफिन नही लाते, उनका इस तरह पीड़ादायक अनुभव से गुजरना ठीक नही है. हमे कुछ करना होगा. प्राचार्य बुजुर्ग हैं, उन्होने अपनी बात रखी और कहा कि सर, कुछ बच्चे बाँटकर भी खाते हैं, वे टिफिन नही लाने वालों को साथी बनाते हैं. यह भी तो जीवन का एक बड़ा पाठ इस उम्र में ये सीख रहे हैं. फिर भी कुछ नई व्यवस्था कर बैठक समाप्त हुई.                            वस्तुतः मैं उस संस्थान के बारे में लिख रहा हूँ, जो हमारा एनजीओ एक गरीब तबके में संचालित कर रहा है. शाला के प्रबंधन की अधिकांश ज़िम्मेदारियाँ मेरे पर हैं. जिंदगी की जद्दोजहद से कुछ समय मैं निकालकर दायित्व बोध के तहत एनजीओ को देता ही हूँ. इस स्कूल में बारहवी तक के बच्चे पढ़ते हैं जिसमें अधिकांश बहुत गरीब परिवारों से हैं. जिनके फीस की व्यवस्था हम परिचितों, मित्रों और अन्य सामाजिक संस्थाओं के जरिए करते हैं. एक बच्चे की साल भर की फीस कोई एक हजार रु. होती है, और हम हर वर्ष किसी न किसी को इस बात के लिए मनाते हैं की साल में एक हजार रु. से अगर किसी गरीब परिवार का बच्चा शिक्षा पा सके तो भला इससे बड़ा पुण्य और क्या हो सकता है. मैं समझता हूँ ऐसी भीषण गरीबी से दो-चार हो रहे परिवार पूरे देश मैं हैं, हर शहर मैं हैं. ईश्वर ने अगर आपको इस लायक बनाया है कि आप सक्षम हैं तो भला इंटरनेट के अथाह ग्यान के युग में कोई गरीब घर का चिराग शिक्षा से आलोकित ना हो तो कहाँ तक जायज है ? सरकारों की काम करने की मंशा और दायरा अपनी जगह है, यदि हम भी एक बच्चे के लिए साल में एक हजार रु. निकल सकें तो मैं समझता हूँ, ये शिक्षा का दीप, दीप से दीप जला सकता है. इसके लिए कहीं कोई जगह तलाशने की आवश्यकता भी नही है. आप जिस शहर मैं हैं सब जगह यह समस्या है, तो क्या आप एक बच्चे की शिक्षा के लिए सोच सकेंगे ? शायद आप ऐसा कर सकते हैं.

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