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गरीब अथवा आत्मनिर्भर परिवार
चिलचिलाती धूप, दोपहर के कोई एक बजे होंगे, हमारी गाड़ी का टायर पन्चर हुआ. ड्राइवर ने बताया, स्टेपनी भी पन्चर है. उसे सुधरवाना वह भूल गया था. थोड़ी झूझलाहट के बाद तय हुआ कि किसी तरह पास के गाँव तक चला जाए, वहाँ पन्चर बन जाएगा. कुछ देर में गाँव पहुँचे, पता चला कार् के टायर के पन्चर की दुकान नही है. वापस 5 कि.मी. जाना होगा.हमने गाड़ी को एक छोटे से होटेल के पास जो चौराहे पर था, लगवाया. ड्राइवर को एक बस से रवाना क्र दिया. हम लोग जिस गाँव में रुके थे, उसका नाम गॅनियरी था, और ये गाँव नाकपुरा से सिर्फ एक कि.मी.दूर था जहाँ हम जाने वाले थे. नाकपुरा छत्तीसगारः के दुर्ग शहर से मात्र 16 कि.मी.दूर स्थित एक बहुत बड़ा जैन धर्म का तीर्थ स्थल है. होली के ठीक एक दिन पहले हम जिस होटेल के पास रुके वह बहुत ही साधारण, ठेठ, देहात का होटल था. कॅबेलू और घास-फूस से बना . साथी ने कहा कि चलो यहाँ चलकर बैठते हैं, ड्राइवर को पन्चर बनाकर वापस आने मे एक घंटे से अधिक तो लगेगा ही. हम एक लकड़ी के बेंच पर बैठ गये. सामने एक टेबल भी रखी थी. होटेल का संचालक और उसकी पत्नी कोई चालीस से पैंतालीस उम्र के बीच के होंगे.महिला बड़े छान रही थी तो पुरुष वाही होटल के एक कोने मे साकले सुधार रहा था. इसी बीच हमने देखा एक 11-12 साल का बच्चा आया और दो खाली जार सायकल पर लादकर चलते बना. वापस आया तो वह सायकल के कर्रिएर के दोनो ओर जारों में पानी भरकर पैदल सायकल को लुड़काते ला रहा था. सायकल खाड़ी कर पानी महिला उतरती और पुरुष बड़ी टंकी में पानी डालते जेया रहा था. एक घंटे में 4 बार वह बालक पानी लेकर इसी प्रक्रिया से गुजरा और फिर अंत में महिला ने उसके लिए समोसे और जलेबी कि प्लेट लगाई. इस दौरान हम देख रहे थे कि, ना तो बालक को किसी ने पानी लाने के लिए कहा, ना किसी ने उसके पानी को सायकल से उतारने के लिए किसी से बालक ने कहा और न ही उतरे हुए पानी को टंकी मे डालने के लिए उस होटल मालिक को किसी ने कहा. एक मौन विभाजन था, उस परिवार के बीच में काम का. मुझे याद आया जयशंकर प्रसाद का छोटा जादूगर. लेकिन ये जादूगर तोड़ा अलग् सा था जो परिवार कि ज़िम्मेदारियों को तो उठा रहा था, पर उस पर मा-बाप का साया था, पर वो संस्कारों के साथ ज़िम्मेदारियों से परिपूर्ण हो रहा था. एक भविष्या निर्माण कि ओर जो उसका खुद का था. हमने होटल में बैठे-बैठे देखा कि उस होटल में जो भी ग्राहक आते, उस महिला और पुरुष को किसी न किसी रिश्ते से जोड़ते जाते. कोई महिला को काकी, कोई बेटी, कोई बहना आदि-आदि और वह उतने ही स्नेह से ग्राहकों के परिवार सहित उनका हालचाल पूछती जाती. हमे बेंच पर बैठे काफी देर हुई तो एक सवारी से भारी बस आकर रुकी, हमने देखा होटल में कुछ लोग आ रहे हैं, हम संकोचवश खड़े हो गये कि होटल का मालिक या मालकिन हमे उठाने के लिए न बोल दे, लेकिन प्रतिक्रिया ठीक उल्टी थी. महिला ने कहा आप लोग क्यों उठ रहे हैं ? आप लोग परेशन हैं. ये लोग तो बस में बैठ हुए आ रहे हैं, ये सिर्फ चे पिएंगे और चले जाएंगे. फिर उसने हमारे सामने दो जग पानी और गिलास रख दिए. प्यास जोर से लगी थी, हम कोई टीन-चार जग पानी पी गये. हमने मशविरा किया कि पानी बहुत अच्छा था और जो आवभगत इस होटेल में हुई है, हमे कुछ राशि इन्हे देनी चाहिए. हमने 50 का नोट देने की कोशिश की, तो होटल का मालिक बोला, बाबू पानी का पैसा देकर आप हमे पाप का भागीदार बनाएंगे. राहगीर को पानी पिलाना तो हमारे धर्म है. साथी ने उसे समझाया आपके पास मिनरल बाटल होती तो हम कम से कम आपको 60 रु- से अधिक देते. हम तो पचास रु.ही दे रहे हैं. उसने दृढ़ता से कहा, नही हम पानी का पैसा नही लेते. फिर हमने चाय मंगाकर पी और फिर 50 रु.का नोट दिया. उसने चार चाय के आठ रु. काटकर शेष वापस किए. साथी ने फिर तर्क दिया, ये चाय हम रायपुर के होटल मे पीते तो हम कम से कम 40 रु. देते. उसने फिर दोहराया, हमारे यहाँ तो यही (8 रु.) रेट है. कोई डेढ़ घंटे बाद ड्राइवर पन्चर बनाकर चक्का लाया और हम गंतव्या की ओर बढ़े. पर वापसी तक हमारे बीच में उस होटल के बारे में ही चर्चा होती रही. होटल के परिवार के बीच काम क विभाजन, होटल में मालिक और ग्राहकों के बीच परिवार सा स्नेह, हमारे लिए आतिथ्य क भाव, निशुल्क पानी की व्यवशता और चाय क दाम------------, सब कुछ आज हमें भा रहा था, हम खुश थे की ग्रामीण परिवेश के इन संस्कारों ने आज हमें वो समझ और सौंदर्य जीवन क सिखाया है, जो शायद हम नाकपुरा के उस विराट मंदिर में भी सीख नही पाते. एक और समझ विकसित हुई की कहीं जाएँ तो सिर्फ ऐतिहासिक इमारतें, मंदिर अथवा जंगल ही मनोहारी नही होते, वहाँ क ग्राम्य जीवन ज्यादा कुछ बोध करता है. हम सोच रहे थे की गॅनियरी क होटल मालिक क परिवार गरीब था अथवा आत्मनिर्भर.
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