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हमारी विरासत, होली का रंग
सीनापाली, छत्तीसगारः की राजधानी रायपुर से कोई 100 कि.मी.से अधिक दूरी पर गरियाबंद के जंगलों में बसा एक ग्राम है. लेकिन इस ग्राम की होली मानो हमको एक संदेश दे रही है. ग्राम मे होली के दो दिन पहले से लेकर रंग पंचमी तक मांस, मदिरा और मच्हली सेवन पर पूरी तरह से प्रतिबंध होता है. पूरा ग्राम एकत्रित होकर होली का उत्सव यज्ञ से शुरू करता है, दो दिन पहले और ये रस्म चलती है पूरे पाँच दिन.इस दौरान अलग-अलग ग्रामो से आकर रामायण मंडलियाँ भजन, कीर्तन करती है चौबीसों घंटे. धार्मिक माहौल से सराबोर वातावरण में पानी में घोलकर रंग खेलने पर पूरी तरह से पाबंदी है.सिर्फ गुलाल का टीका एक दूसरे को लगाकार अभिवादन करते हैं.अगर किसी ने भी परंपराओं के खिलाफ इन पाँच दिनो में मांस, मदिरा या मच्हली का सेवन किया अथवा रंग पानी में घोलकर खेला तो पूरा ग्राम ऐसा करने वाले के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करता है. यह परंपरा इस ग्राम की सदियों से चली आ रही बेमिसाल संस्कारों की बानगी है. जरा हम होली पर्व के इतिहास मे झाँककर देखे तो वस्तुतः इसका आयोजन प्रहलाद के दृढ़ इरादों, बुराई के सामने ना झुकने का अटल विश्वास और पावन चरित्र की याद में शायद हमने होली का पर्व मानना शुरू किया होगा. लेकिन देखिए हम साक्षर कहलाते हैं, विकास की दौड़ मे आधुनिक इतने कि इंटरनेट की उंगलियों पर दुनिया जहान की जानकारियों पर इतराते हैं, पर होली कैसे मनाते है, तथाकथित सभ्य समाज और बड़े -च्छोते शहरों में. सारी दुकाने बंद, मानो करफू लगा है. नशे में धुत्त, बेतुकी व्यंग्यों और लफ़्जों का इस्तेमाल, रंग ऐसे-ऐसे कि लगे तो कई दिनों तक कई लीटर पानी और साबुन का इस्तेमाल कर भी ना छूटे और कहीं-कहीं तो नालियों का कीचड़ भी होली खेलने का शौक होता है. काश, हम आधुनिकता की दौड़ में सीनापली से कुछ सीख पाएँ. शायद प्रहलाद के मूल्यों के साथ इस ग्राम मे हमारी विराट परंपरा की लौ आलोकित है जो संदेश दे रही है की कैसे हमे त्योहारों के संस्कार पीढ़ियों को थाती के रूप में सौंपने है. सभी महानुभवों को होली की अग्रिम शुभकामनाएँ
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