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Sunday 20 July, 2008
 16:41 | 7/Mar/2008 |  2 Comment(s)
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हमारी आस्था, हमारी संस्कृति

महाशिवरात्रि की पुण्य बेला, सुबह के आठ बजे, हम छत्तीसगार के राजिम कुंभ के त्रिवेणी संगम (महानदी, पैरी एवं सोन्धुर नदियों) पर पहुँचे. ललक थी माँ सीता द्वारा संगम पर स्थापित कुलेश्वर महादेव के दर्शन की. दर्शन के लिए लंबी कतार थी. जानकारी लेने पर पता चला, लोग रात से क़तार मे लगे हैं. हमने एक दर्शनार्थय से पूछा की दर्शन का क्या कोई शार्टकट है? वह गंभीर हो गया. बोला, कुछ लोग कर तो रहे हैं, पर मैं स्वयं रात को दो बजे लाइन मे लगा था और मुझे सुबह सात बजे दर्शन करने को मिले हैं. कम से कम भगवान के दरबार में दर्शन के लिए इस क़तार का ही नियम है. इसके बाहर जाकर आप दर्शन तो कर सकते हैं पर आप सोचिए क्या आप जिसके दर्शन के लिए आए हैं उसकी डायरी में किस तरह जोड़े जाएंगे? यही न की ये मेरे भक्तों को जो क़तार मे खड़े हैं उनको धोखा देकर यहाँ तक पहुँच गये. फिर भक्त के पीछे पीछे तो स्वयम् भगवान चलते है. क्या ऐसा दर्शन करना ठीक रहेगा, आप ही तय कीजिए. जिस निश्छलता से उस व्यक्ति ने एक सांस में अपनी बात कह दी, और चलता बना, हम सबके लिए एक बड़ा सबब था. हम देख रहे थे डोर दराज के गावों से पैदल ही रैला का रैला गाँवों से आ रहा था,जिसमे बड़ी संख्या में बच्चों और महिलाओं की तादाद थी. लोग आते और तोलो की टोली एक अनुशाशित दस्ते की तरह क़तार मे जुड़ते जाते, न कोई शिकवा, न कोई शिकायत, न कोई जल्दबाजी की कब तक दर्शन होंगे. दूसरी ऑर शाही स्नान के लिए हज़ारों की संख्या में साधुजन अपने प्रतीक दंड,छतरी, सजे हुए घोड़े और रथ एवं विभिन्न प्रदर्शणो के साथ रैली में चल रहे थे. एक के बाद एक वे नदी में डुबकी लगाते और आनंद के साथ अपनी कुटियों की ऑर ब्रह् रहे थे. पता चला साधुओं की संख्या कोई छह हजार से उपर है जो उत्तरप्रदेश, हिमाचल, जम्मू कश्मीर, दिल्ली, हरियाणा, गुजरात, राजस्थान इत्यादि सहित देश के हर कोने से पधारे हैं. हमने जम्मू कश्मीर से पधारे एक साधु से सवाल किया, महाराज, आप इतनी दूर से आए हैं, आपके तो रास्ते में ही बड़े बड़े तीर्थ स्थल हैं फिर यहाँ पधारना हमे उत्सुकता पैदा कर रहा है. वे हँसे और बोले, मैं अकेला नहीं हमारे बड़ा दल आया है. यहाँ हम क्यों आए हैं, यहाँ खड़े होकर आप यह सवाल हर किसी से पूछ सकते हैं. शुरूवात आप अपने से ही करे ! ये तीर्थ स्थल बड़ा होने या छोटे होने का सवाल नहीं है, सवाल हमारी आस्था का है, उसमे क्या मिला, क्या खोया इसका हिसाब नहीं किया जाता. आपको मालूम हॅना चाहिए शंकराचार्य जी ने देश के चार कोनो में चार धाम स्थापित कर इस बात का अहसास दिलाया है कि देश मे इलाक़े अलग्-अलग् और दूर दूर हो सकते हैं पर हमारी आस्था एक है, जो हमे एक संस्कृति से जोड़ती है. सचमुच संत की बातों में दम था, हम देख भी रहे थे कि आस्था का सैलाब लाखों की संख्या में क़तार में था और उतनी ही संख्या में डुबकी भी लगा रहा था. दर्शन कुलेश्वर महादेव के भले नहीं हुए पर जी में संतोष था कि वाह हमारी आस्था, हमारी संस्कृति. जिस आस्था से कश्मीर का साधु भी यहाँ डुबकी लगा रहा है उस आस्था से यहाँ का आम आदमी भी नतमस्तक है. एक अदृश्य आस्था से

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