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जीने का हक़
जीने का हक़, पैदा होने के बाद, सबसे ज्यादा सुरक्षित है, मनुष्य के पास. अन्य प्राणियों के जीने के हक़ पर सबसे ज्यादा चोट भी की है, मनुष्य नामक प्राणी ने, अपने शौक के लिए, अपने लोभ के लिए अथवा अपनी जिह्वालिप्सा के लिए. किन्तु, उसने अपने लिए समय के साथ अलग्-अलग सुरक्षा कवच खड़े किए. जितना आधुनिक हुआ, मनुष्य उसने उतने ही नये कवच अपने लिए बनाए. इनमे एक है मानवाधिकार. इस मानवाधिकार के रंग अलग्-अलग् हैं. ये बात अलग् है की इसमे मनुष्या के वास्तविक मानवाधिकार की कितनी वक़ालत होती है ? मसलन पिच्छले दिनो नक्सलाटों ने उड़ीसा और हत्तीसगारः में आदमियों को इस हद तक मौत के घाट उतारा, शायद वैसा घृणित कम तो तैमूर लंग के क़त्लेआम मे भी नही हुआ होगा ? लेकिन देखिए मानवाधिकारों की वक़ालत करने वाले बड़े बड़े नामचीन हस्तियों की कोशिशों को. मेधा पाटेकर छत्तिस्गर्ह की राजधानी रायपुर जेल मे बंद एक नक्सलाइट समर्थक, उन्हे मानसिक रूप से उर्जा देने वाले, उन्हे पत्रा लिखकर लामबंद होने के लिए उकसाने वाले विनायक सेन की गिरफ़्तारी को सरकार की मानवाधिकारों के खिलाफ साजिश करार देती हैं, पर दूसरे ही दिन बस्तर के जंगलों में नक्सलाइट ने कई गरीब आदिवासियों को मौत के घाट उतारा, पर वे इस पर टिप्पणी नही कर पाई. क्या नक्सलाटों द्वारा अनपढ़, गरीब आदिवासियों से जीने का हक़ च्हिनना मानवाधिकार पर प्रश्न नही खड़ा करता ? यदि ऐसा होता तो शायद मेधा पाटेकर को इस पर भी टिप्पणी करनी चाहिए थी. शायद, मानवाधिकार का मुद्दा उठाना भी एक आधुनिक शगल हो गया है. तभी तो हम इस पर दोहरे मापदंड रखते हैं !
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