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राम जाने ,कब होगा ,गांधी के सपनो का भारत .
एक नहीं, कई बार पढ़ने को मिला कि गांधीजी ने आजादी के बाद हमेंशा इस बात क़ी वकालत क़ी कि देश के विकास के लिए जो भी नीतियाँ बनाईं जाएँ उसमें समाज के अन्तिम व्यक्ति का चेहरा सामने हो.आज में उस चेहरे को तो ,सामने साक्षात खड़ा देख रहा था,पर ये चेहरा गांधीजी को तलाश रहा था,काश बापू तेरी बातों पर अमल होता, तो ये चेहरा इतना बेबश नॅ होता. इंजीनियरिंग क़ी होनहार छात्रा,ई & सी फ़ोर्थ सेमेस्टर में टॉप टेन में जगह बनाने के बाद, उसकी पढ़ाई इसलिए अवरूध हो गयी कि वह निजि इंजीनियरिंग कालेज के पंचम सेमेस्टर क़ी फिश देने में अक्षम थी.मा-बाप दोनो क़ी लंबी बीमारी ने घर क़ी आर्थिक स्थिति इतनी माली हो गयी कि पढ़ाई क़ी फिश तो दूर् घर में दो जून क़ी रोटी भी मय्यसर भी नहीं हो रही थी.हमने दोस्तों के साथ मिलर कर जब उसकी फिश का बंदोबस्त किया और चेक उसके हाथों में थमाया तो वह भावशून्य हो गयी. बहुत झिझकते हुए उसने कहा सर में जीवन में इस सहयोग को कभी नहीं भूल पाँऊ गी और आपके पैसे भी लौटा दूँगी.हमने उससे कहा अवश्य लौटना लेकिन हमें नहीं, तुम्हारे जैसा कोई होनहार ऐसी दुविधा के भवर में फस जाय उसे.
में एक ऐसी होनहार छात्रा का उल्लेख यंहा सिर्फ इसलिए कर रहा हूँ कि बढ़चढ़ कर आजकल ,बॅंक लौन से उच्च शिक्षा का जो दावा किया जा रहा है,वह आम आदमी के लिए बिल्कुल भी नहीं है.इस छात्रा जैसे कितने ही ऐसी प्रतिभाएं ,आज हमारे देश में हैं ,जो अभावो के बीच दम तोड़ रहीं हैं उँचाई छुने के पहले ही.राम जाने ,कब होगा ,गांधी के सपनो का भारत . फिर भी अगर ईश्वर ने ,अगर आप को सक्षम बनाया है तो आएँ हम स्वयं दीप से दीप जलाएँ. ......
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जयपुर की सड़कें अगर बोल सकतीं ------
कौन हैं ये लोग ? नहीं ,ये कतई इंसान नहीं हो सकते?,न हीं इनका किसी धर्म से कोई वास्ता हो सकता है क्या एक इन्शान ऐसा घृणित तांडव कर सकता है ?क्या कोई धर्म इसकी इजाजत देता है ?जयपुर की सड़कें अगर बोल सकतीं, तो शायद हम इंसानो से यही सवाल करतीं! 13 मई 2008 जयपुर के पहले, हैवानियत का यही तांडव हैद्राबाद, अजमेर, वाराणसी,मुंबई आदि-आदि कई स्थानो पर देश में दोहराया जा चुका है? सवाल खड़ा होता है कि आखिर मुठ्ठीभर रुग्ण मानसिकता के लोग हमारे विशाल तन्त्र को कैसे अंगूठा दिखाने में सफल हो जा रहें हैं? सवाल हम सबकी अंतरात्मा भी हम से कर रही है,क्या हम सिर्फ मूकदर्शक बनकर सवेंदनाएँ व्य़क्त भर कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लें? हर व्यक्ति को कम से कम दो स्तर पर तो काम करने की कोशिश करनी ही चाहिए.एक,हम स्वयं इसपर जिम्मेदारी का परिचय दें, कमसे कम इसके विरोध में कुच्छ न कुच्छ अभिव्यक्ति जरूर दें, इसके लिए प्रिट मीडिया,इलेक्ट्रानिक मीडिया अथवा जहाँ आपको अभिव्यक्ता का मंच मिले,वँहा सिर्फ घटना की आलोचना ही नहीं एक मुहिम के रूप में ,हमारे सत्ता के कर्णधारों से पुछे कि आखिर एक ही तरह कि घटनाओं क़ी पुनरावृति कैसे हो रही है? पिछलि घटनाओं पर कितनी छानबीन, अनुसंधान , नीति आदि आदि अपनाई गयी और उसपर कितना अमली जमा पहनाया गया ?लोकतंत्र में जनता का भय खाकर ,अगर ,सत्ताधीश एक आतंकवादी को सुप्रीमकोर्ट के निर्णय के बाद भी फांसी देने में घबरा रहें हैं,तो क्या,जनता बड़ा वर्ग उनसें जयपुर जैसी घटनाओ में माताओ,बहनो, मासूम बच्चो की मौत का हिसाब माँगने लगेंगे तो असर नहीं होगा? निश्चित तौर उंहें सिर्फ मौत के तांडव पर ही रेड अलर्ट जारी करने की फिक्र नहीं होगी ,अपितु हमेंशा तन्त्र को रेडी रखने की भी चिंता की तो शुरूवात करनी होगी?हमारा लोकतंत्र वर्तमान में सिर्फ और सिर्फ जाती,धर्म,प्रदेशिकता,भाषा,आदि आदि गैर जरूरी मूल्यों के इर्दगिर्द घूमरहा है,तो उसे मानवीय मूल्यों के प्रति भी सजग हो इसकी पहल हमें ही करनीहोगी.
दूसरा, शायद हम एक काम और कर सकते हैं कि हम किसी भी धर्म,पंथ,संप्रदाय के हों अगर कहीं भी चाहे वह कोई धार्मिक स्थल ही क्यो न हो यदि वहा इन्शनियत को खत्म करने का कारोबार संचालित किए जाने क़ी कोशिश हो रही हो ,तो इसका विरोध होना चाहिए चाहे इसके लिए आपको वह धर्म अथवा संप्रदाय छोड़ना क्यो न पड़े .वरना जयपुर की लाशों में, आपका भी कोई भाई बंधु कल दिखे ,तो पछतावे के आला कुछ नही रह जायेगा .हम एक जैसा पानी पीते हैं,एक जैसी हवा से सास लेकर जिंदा है,हाड़ -मास का शरीर भी एक जैसा है.फिर धर्म के नाम पर ,क्या हम एक दूसरे को खत्म करने क़ी शौच सकते हैं.?सच तो यह कि ईश्वर भी हम सबका एक है,नाम सिर्फ अलग-अलग है.कब समझेगे ये हम. आओ हम जयपुर के मासूम आहूतों को श्रद्दांजलि दें..ओम शांति--------
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कुदरत का कोहिनूर - पोन्ग ग्यांग लेक
''इस पत्थर को आप छोड़ दीजिए,अपने आप इस पहाड़ी क़ी गर्त में चला जाएगा,पर इसे पहाड़ क़ी चोटी पर ले जाने के लिए बहुत प्रयास करना होगा.ठीक इसी तरह है भौतिक प्रगति और अध्यात्मिक प्रगति में भिन्नता है. एक सरल है जो भौतिक है,दूसरी कठिन है, पर यही मानव जीवन का सार है,निर्वाण का पथ है.'' यह प्रेरक उदगर थे पूजनीय एक लामा के हेमिस गुम्पा में.यह गुम्पा लद्दाख क़ी सबसे प्राचीन और प्रसिद्द गुम्पा में से एक है.इसका पूरा वातावरण चित्ताकर्षक है. पथ परंपरा के गुरु क़ी विशाल आभा युक्त लावण्यमय मूर्ति,पंक्ति बद्द होकर बैठे लामा-ओ का सस्वर ग्रंथो का पाठ,बोद्द धर्म पर तिब्बती भाषा में लिखी प्राचीन पांडु लिपियों का दुर्लभव संग्रह और सलीके से रखी गयी सामग्री लुभाती है.छोटे लामा-ओ क़ी उपस्थिति पर हमें जानने क़ी जिग्यासा हुई तो पता चला क़ी बहुत से परिवार लड़कपन से उन्हे दीक्षा के लिए गुंपाओ को सौंप देते हैं .यह लद्दाख क़ी परम्परा का हिस्सा है.ऐसा हमें अन्या गुप्ाओ में भी देखने को मिला . लेह के आस-पास गुंपाओ और अन्या जगहो को देखने के बाद ,हम लद्दाख का सबसे आकर्षण का केन्द्र पोन्ग ग्यांग झील को देखने को निकल पड़े .यह लेह से कोई 160 कि.मी.दूर है.बीच का पूरा रास्ता पथरीले रेगिस्तान का और घुमावदार पहाड़ियो वाला है.बीच में दुनिया का सबसे उंचा तीसरा सड़क मार्ग 'चांगला दर्रे '' से होकर हम गुजरे तो प्रकृति कि हमपर विशेष अनुकम्पा हुई,शानदार बर्फ़बारी ने मानो हमारी मुँह मांगी मुराद पूरी कर दी.साथ ही इस स्थान पर पहुँचकर हमें भारत-चीन युद्द में हमारे सैनिको का, वो शौर्य याद आया, जंहा से,चीनी ड्रेगन को देश के बहादूर सैनिको ने करारी शिकस्त दी थी, इसके बाद चीन एक-तरफ़ा युध्य बंदी कि घोषणा करनी पड़ी थी. चांगला से कोई 60 कि.मी. की दूर तय कर हम पहुन्चे, पोन्ग ग्यांग झील.प्रकृति का एक अदभुय नजारा,इतनी विराट झील,इन सूनी पहाड़ियो के बीच हो सकती है? यह अहसास रोमाचाक और दाँतों तले अंगुली दबाने जैसा है.झील की रमणीयता को व्य़क्त कर मेरे लिए संभव नहीं ज़ान पड़ रहा है.पानी की छटा बिल्कुल ही निराली ,एकदम नीला और हा रंग वर्णटीत है.दूसरी तरफ पॅहडो की सुन्दरता भी मनमोहक है.भुरे,स्याह काले, नीले,पहाड़ इतने लुभावने हैं कि जान पड़ता है कि मानो स्वयं भगवान इन पर कनवास के रंग भरे हो.बीच-बीच में बर्फ ढके पहाड़,ठंडी बहती हवा और झील की गरजना, तो मानो समुन्द्रा के किनारे का अहसास करा रही है.प्रकृति का इतना विविधतापूर्ण नजारा शायद ही और कहीं देखने को मिले.झील के किनारे आगे बढ़ने पर एक स्थान पर हमें रोक दिया गया .पता चला इस झील की लगभग 130कि.मी.लंबाई में से दो-तिहाई भाग पर सन 1962के युध्य में चीन ने कब्जा कर रखा है.हमे लगा चीन हमारी प्रकृति के खूबसूरत कोहिनूर पर कब्जा कर रखा है.जो एक उदास करने वाला असहनीय पल आपको लगेगा.इसे झील नहीं आप शेष -शायी भगवान विष्णु का क्षीर सागर कह सकते हैं,तभी तो इतना सुंदर अहसास हो रहा है.मैं तो यही कह सकता हूँ कि बिना पोन्ग ग्यांग झील जाए,आपका लद्दाख जाना अधूरा ही होगा.
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सिंधु घाटी के तट से राष्ट्रीयतì 6; के नाम
जीवन में कुछ अनुभव,कुछ लम्हे और कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जो स्मृतियों के खजाने में खास जगह रखते हैं.ऐसा ही , ये अवसर था,हम उस सिंधु नदी के तट पर खड़े थे जिसके साये में हमारी पुरखों की विरासत बिखरी पड़ी है, सिंधु घाटी की सभ्यता के नाम से. लेह के सिंधु घाट पर अलग- अलग गुंपाओ [बौध्य धर्म के सन्यासी स्थल ] से आए लामा, मंत्रोचारण के साथ महानदी [छ.ग.]से लाया जल ,सिन्धुनदी के जल में अर्पित कर रहे थे. ये हमारे लिए सुखद अनुभव था, उस यात्रा का जो हमने ''राष्ट्रीय एकता/ अखंडता और सदभावना'' के नाम से शुरू की थी, 21 साथियों के साथ रायपुर [छ.ग.] से. यात्रा का एक च्छोटा सा उद्देश्य हमने रखा था कि छ्तिसगद के जंगलों मे नक्सलाइट और कश्मीर की वादियो में आतंकवादी मानवीयता को चुनौती दे रहे है ,तो क्यो ना हम भी हमारी महान संस्कृति का संदेश को बुलद करे.जिसमे सिर्फ और सिर्फ मानवीय भाईचारा का संदेश पग-पग पर है.जिसका ज्वलंत उदाहरण है बौध्य धर्म, जो आज लद्धख में फल फूल रहा है ,वही कभी छत्तिस्गद क़ी महानदी के सिरपुर में अपने विकास क़ी चरम स्थिति में था. इस हेतु हमने प्रतीकात्मक रूप से महानदी के जल को चुना. हमारी यात्रा 27 अगस्त को शुरू हुई और लद्धख महोत्सवा के दिन 1 सितांबेर को उसका समापन हुआ . यात्रा का समापन इतना शानदार होगा, यह तो हमारी कल्पना में भी नही था.सिंधु घाट पर ,एक साथ इतने सारे पूजनीय वरिष्ट लमओ का आना ,लद्धख हिल कौंसिल के मुखिया का साथ होना और लेह से हमे जम्मू व कश्मीर के सी.म.क़ी और से रवानगी सचमुच हमे कायल कर रही थी.खासकर पूजनीय लमओ का जो वीतरागी हैं, उनका बड़ी संख्या में हमारे कार्यकर्म में पहुँचना, किसी आश्चर्य से कम हमारे लिए नहीं था . हमारी यात्रा क़ी शुरूवात भी, पूजनीय संत पवन दीवान और 11 बॅट्यूको के मंत्रोचरण के साथ हुई. जिसे रायपुर से रवानगी दी ,छ.ग.के सी.म. ने.,कुल मिलाकर हमे लगा क़ी संतो ने ढीक ही कहा है कि 'अगर उद्देश्य पवित्रा हो, तो सारी बाधाएं कट जाती हैं .वरना ,हमारे जैसे साधारण लोगो के लिए ,यह संभव ही नहीं था कि इस यात्रा में एक साथ ,इतनी बड़ी विभूतियो क़ी शिरकत हो पाती . मैं कई बार शायद लद्दाख और जा सकता हू .पर , क्या पूजनीय लमऊ का सिंधु घाटी पर ये सनिध्ज्य मिलेगा / क्या एक उद्देश्य के साथ ,इतने सारे साथियो को एकत्रित कर सकूँगा ,शायद नही ? जीवन के सँस्मरनू के खजाने मे ये एक अनोखा संग्र्ह है ,यह यात्रा मेरे लिए .
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ये तो शिव का साक्षात था-----------
हम चकित थे, प्रकृति के अद्भुत सौंदर्य से. सूरज की लालिमा के साथ ग्लेशियर सुर्ख ताम्र वर्ण से दमक रहा था. सब अपलक, अनिमेष निहार रहे थे. मानो, साक्षात भगवान शंकर का अवतरण हुआ है. एक पल को याद आया की क्यों कथाओं में और लेखों में सूरज की पहली किरणों को सविता कहा गया है. सविता यानी ग्यान, मेधा और प्रग्या की साक्षात देवी जिसकी महिमा वेदों में गायत्री मंत्र में महिमा मंडित की गई है. सचमुच आज हम इन पहाड़ियों के बीच न होते तो जीवन में सविता के इस साक्षात स्वरूप को नही समझ पाते. इतना अद्भुत सौंदर्य था, ग्लेशियर पर पड़ने वाली सूरज की पहली किरणों का . शायद उसे शब्दों में पिरोना मेरे लिए तो संभव नही है. इतना जरूर है कि शिव और सविता के साक्षात स्वरूप को हम महसूस कर पाए . उस अद्भुत कुद्रात के सौंदर्य में. हम ऊनिन्दे, अलसुबह 4 बजे कैलन्ग से लेह के लिए रवाना हुए थे. तो कड़ाके की ठंड और नींद दोनो बड़ी तकलीफ़देह लग रही थी.लुचूलुंग दर्रा (16600 फीट) पारकर हम बस से इस रास्ते के सबसे उँचे दर्रे टांगला (17469 फीट) की ओर जा रहे थे. दूर -दूर् तक वीरान पहाड़ियों पर हरियाली का तो नामोनिशान नही था. धीरे-धीरे बस बढ़ने के साथ ऐसा लग रहा था कि हमने खतरनाक और बंजर रास्ते को चुनकर शायद बड़ी भूल कर दी है, पर प्रकृति जितनी कठोर होती है उसका सौम्य रूप भी उतना ही अद्भुत होता है. टांगला के पहले बर्फ पर पद सूरज की किरणों ने हम सब को मोह लिया था. हमने मनाली के ठीक पहले भीषण बारिश में बादल फटने की घटना के साक्षात गवाह थे, जिसमे कई ट्रक और गाड़ियाँ घाटी में बह गई थी. हम उस खतरनाक लम्हे को याद कर अब समझ गये थे कि वो शिव का रुद्र रूप था और सामने कल्याणकारी शिव के दर्शन इस ग्लेशियर पर पड़ती सूरज की किरणों से हो रहा है. टांगला दर्रे की सबसे उँचे स्थान पर जाते ही बस खड़ी हुई. हमारे साथ उपस्थित मुझे और अन्य दो साथियों को छोड़कर सबको उल्टियां हो रही थी और सब चक्कर आने की शिकायत कर रहे थे. वहाँ उपस्थित जवानो ने आवश्यक हिदायत दी और सबको लहसून की कलियाँ खाने को थमाया. टांगला के बाद हम जैसे-जैसे आगे लेह की ओर बढ़ते गये दुर्गम पहाड़ी रास्ते में झीनी सी बिछी बर्फ की चादर मन को भा रही थी. लेकिन पहाड़ इतने वीरान थे कि वहाँ जीवन कि कोई छटा नजर नही आ रही थी. ना पक्षी, ना कीट, ना पतंग, ना पशु और ना मानव, सब कुछ वीरान और वीरान ही नजर आ रहा था. पहाड़ियों की ज़ंसकार रेंज आने के बाद बताया गया कि आगे रूंगत्से से पहला गाँव पड़ेगा. वस्तुत: हमारी यह यात्रा 21 साथियों के साथ एक छोटा सा विचार लेकर छत्तीसगारः से शुरू हुई थी जिसके बीच के पड़ाव से हम गुजर रहे थे.सचमुच यात्रा दुर्गम थी पर प्रकृति का अद्भुत सौंदर्य इन कठोरताओं में ही लावन्या बिखेर रहा था, जिसे अनुभूत किए बिना नही समझा जा सकता. यात्रा की शेष जानकारी किसी अन्य दिन आपसे बांटने की कोशिश फिर करूंगा
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इसे तो हम कर सकते हैं
सुबह के लगभग 9 बजे होंगे, मैं शाला के निरीक्षण में पहुँचा. पता चला, रिशेस है. कुछ बच्चे टिफिन खोलकर खाना खा रहे थे, कुछ उनके पास बैठे उन्हे निहार रहे थे. मैं नज़दीक पहुँचा. एक बच्चे से बात की, पूछा, तुम टिफिन नही लाते? बच्चा 8 साल का रहा होगा, अबोध भाव से कहा, नही सर. मेरे यहाँ टिफिन नही बनती है. मेरे दाई-ददा (मा-बाप ) तो काम पर चले जाते हैं.मैने देखा कई छोटे बच्चे अबोध भाव से साथी से ख़ांना भी माँग रहे थे. यह दृश्य मुझे अत्यंत विव्हल कर रहा था. मैं समझ गया था कि ये सारे बच्चे जिनके पास टिफिन नही है, वो श्रमिक परिवारों के बच्चे हैं, जहाँ दो जून की रोटी के लिए भी जी-तोड़ मेहनत करनी पड़ती है. मैने तत्काल प्रधान पाठिका से बात की, फिर प्राचार्य को भी बुलवाया. हमने एक मीटिंग की, मैने तर्क रखा, इस तरह रिशेस में कुछ बच्चे टिफिन नही लाते, उनका इस तरह पीड़ादायक अनुभव से गुजरना ठीक नही है. हमे कुछ करना होगा. प्राचार्य बुजुर्ग हैं, उन्होने अपनी बात रखी और कहा कि सर, कुछ बच्चे बाँटकर भी खाते हैं, वे टिफिन नही लाने वालों को साथी बनाते हैं. यह भी तो जीवन का एक बड़ा पाठ इस उम्र में ये सीख रहे हैं. फिर भी कुछ नई व्यवस्था कर बैठक समाप्त हुई. वस्तुतः मैं उस संस्थान के बारे में लिख रहा हूँ, जो हमारा एनजीओ एक गरीब तबके में संचालित कर रहा है. शाला के प्रबंधन की अधिकांश ज़िम्मेदारियाँ मेरे पर हैं. जिंदगी की जद्दोजहद से कुछ समय मैं निकालकर दायित्व बोध के तहत एनजीओ को देता ही हूँ. इस स्कूल में बारहवी तक के बच्चे पढ़ते हैं जिसमें अधिकांश बहुत गरीब परिवारों से हैं. जिनके फीस की व्यवस्था हम परिचितों, मित्रों और अन्य सामाजिक संस्थाओं के जरिए करते हैं. एक बच्चे की साल भर की फीस कोई एक हजार रु. होती है, और हम हर वर्ष किसी न किसी को इस बात के लिए मनाते हैं की साल में एक हजार रु. से अगर किसी गरीब परिवार का बच्चा शिक्षा पा सके तो भला इससे बड़ा पुण्य और क्या हो सकता है. मैं समझता हूँ ऐसी भीषण गरीबी से दो-चार हो रहे परिवार पूरे देश मैं हैं, हर शहर मैं हैं. ईश्वर ने अगर आपको इस लायक बनाया है कि आप सक्षम हैं तो भला इंटरनेट के अथाह ग्यान के युग में कोई गरीब घर का चिराग शिक्षा से आलोकित ना हो तो कहाँ तक जायज है ? सरकारों की काम करने की मंशा और दायरा अपनी जगह है, यदि हम भी एक बच्चे के लिए साल में एक हजार रु. निकल सकें तो मैं समझता हूँ, ये शिक्षा का दीप, दीप से दीप जला सकता है. इसके लिए कहीं कोई जगह तलाशने की आवश्यकता भी नही है. आप जिस शहर मैं हैं सब जगह यह समस्या है, तो क्या आप एक बच्चे की शिक्षा के लिए सोच सकेंगे ? शायद आप ऐसा कर सकते हैं.
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गरीब अथवा आत्मनिर्भर परिवार
चिलचिलाती धूप, दोपहर के कोई एक बजे होंगे, हमारी गाड़ी का टायर पन्चर हुआ. ड्राइवर ने बताया, स्टेपनी भी पन्चर है. उसे सुधरवाना वह भूल गया था. थोड़ी झूझलाहट के बाद तय हुआ कि किसी तरह पास के गाँव तक चला जाए, वहाँ पन्चर बन जाएगा. कुछ देर में गाँव पहुँचे, पता चला कार् के टायर के पन्चर की दुकान नही है. वापस 5 कि.मी. जाना होगा.हमने गाड़ी को एक छोटे से होटेल के पास जो चौराहे पर था, लगवाया. ड्राइवर को एक बस से रवाना क्र दिया. हम लोग जिस गाँव में रुके थे, उसका नाम गॅनियरी था, और ये गाँव नाकपुरा से सिर्फ एक कि.मी.दूर था जहाँ हम जाने वाले थे. नाकपुरा छत्तीसगारः के दुर्ग शहर से मात्र 16 कि.मी.दूर स्थित एक बहुत बड़ा जैन धर्म का तीर्थ स्थल है. होली के ठीक एक दिन पहले हम जिस होटेल के पास रुके वह बहुत ही साधारण, ठेठ, देहात का होटल था. कॅबेलू और घास-फूस से बना . साथी ने कहा कि चलो यहाँ चलकर बैठते हैं, ड्राइवर को पन्चर बनाकर वापस आने मे एक घंटे से अधिक तो लगेगा ही. हम एक लकड़ी के बेंच पर बैठ गये. सामने एक टेबल भी रखी थी. होटेल का संचालक और उसकी पत्नी कोई चालीस से पैंतालीस उम्र के बीच के होंगे.महिला बड़े छान रही थी तो पुरुष वाही होटल के एक कोने मे साकले सुधार रहा था. इसी बीच हमने देखा एक 11-12 साल का बच्चा आया और दो खाली जार सायकल पर लादकर चलते बना. वापस आया तो वह सायकल के कर्रिएर के दोनो ओर जारों में पानी भरकर पैदल सायकल को लुड़काते ला रहा था. सायकल खाड़ी कर पानी महिला उतरती और पुरुष बड़ी टंकी में पानी डालते जेया रहा था. एक घंटे में 4 बार वह बालक पानी लेकर इसी प्रक्रिया से गुजरा और फिर अंत में महिला ने उसके लिए समोसे और जलेबी कि प्लेट लगाई. इस दौरान हम देख रहे थे कि, ना तो बालक को किसी ने पानी लाने के लिए कहा, ना किसी ने उसके पानी को सायकल से उतारने के लिए किसी से बालक ने कहा और न ही उतरे हुए पानी को टंकी मे डालने के लिए उस होटल मालिक को किसी ने कहा. एक मौन विभाजन था, उस परिवार के बीच में काम का. मुझे याद आया जयशंकर प्रसाद का छोटा जादूगर. लेकिन ये जादूगर तोड़ा अलग् सा था जो परिवार कि ज़िम्मेदारियों को तो उठा रहा था, पर उस पर मा-बाप का साया था, पर वो संस्कारों के साथ ज़िम्मेदारियों से परिपूर्ण हो रहा था. एक भविष्या निर्माण कि ओर जो उसका खुद का था. हमने होटल में बैठे-बैठे देखा कि उस होटल में जो भी ग्राहक आते, उस महिला और पुरुष को किसी न किसी रिश्ते से जोड़ते जाते. कोई महिला को काकी, कोई बेटी, कोई बहना आदि-आदि और वह उतने ही स्नेह से ग्राहकों के परिवार सहित उनका हालचाल पूछती जाती. हमे बेंच पर बैठे काफी देर हुई तो एक सवारी से भारी बस आकर रुकी, हमने देखा होटल में कुछ लोग आ रहे हैं, हम संकोचवश खड़े हो गये कि होटल का मालिक या मालकिन हमे उठाने के लिए न बोल दे, लेकिन प्रतिक्रिया ठीक उल्टी थी. महिला ने कहा आप लोग क्यों उठ रहे हैं ? आप लोग परेशन हैं. ये लोग तो बस में बैठ हुए आ रहे हैं, ये सिर्फ चे पिएंगे और चले जाएंगे. फिर उसने हमारे सामने दो जग पानी और गिलास रख दिए. प्यास जोर से लगी थी, हम कोई टीन-चार जग पानी पी गये. हमने मशविरा किया कि पानी बहुत अच्छा था और जो आवभगत इस होटेल में हुई है, हमे कुछ राशि इन्हे देनी चाहिए. हमने 50 का नोट देने की कोशिश की, तो होटल का मालिक बोला, बाबू पानी का पैसा देकर आप हमे पाप का भागीदार बनाएंगे. राहगीर को पानी पिलाना तो हमारे धर्म है. साथी ने उसे समझाया आपके पास मिनरल बाटल होती तो हम कम से कम आपको 60 रु- से अधिक देते. हम तो पचास रु.ही दे रहे हैं. उसने दृढ़ता से कहा, नही हम पानी का पैसा नही लेते. फिर हमने चाय मंगाकर पी और फिर 50 रु.का नोट दिया. उसने चार चाय के आठ रु. काटकर शेष वापस किए. साथी ने फिर | | | | |